सागर के तट पर जहाँ तक आपकी नज़रें जाती हैं, आपको श्रद्धालुओं का सैलाब नज़र आता है। जनवरी की घनी हवाएं मिट्टी की महकती खुशबू का एहसास देती हैं। मंत्रों के सुर में घंटियों की गूंजती खनखनाहट चारों ओर एक आध्यात्मिक परिवेश का सृजन करती है। जब आप एक ही झलक में इन सभी चीज़ों को एक साथ निहारते हैं, तो खुद ही समझ जाते हैं कि आप गंगासागर में हैं।

गंगासागर के धार्मिक रिवाजों में सबसे महत्वपूर्ण है पावन जल में प्रातःकाल के समय स्नान करना। यह तो लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है जो उन्हें यहाँ की ठिठुरती सर्दियों में भी हर पल अनुप्राणित करती है। सबसे पहले, नागा साधुओं समेत हिमालय से आए संत-संन्यासी शाही स्नान लेते हैं। इसके बाद एकत्रित भक्तगण गंगासागर स्नान का परम आनंद लेते हैं। उनकी सभी आशाएँ और प्रार्थनाएँ इसी लक्ष्य से प्रेरित रहती हैं कि उन्हें ‘मोक्ष’ मिले जो आत्मा की मुक्ति का परम प्रतीक है।

श्रद्धालुगण सूर्य देवता की भी उपासना करते हैं एवं अपने पूर्वजों की याद में और इस सांसारिक मोह-माया से अपनी आत्माओं को मुक्ति दिलाने की चाह में धार्मिक संस्कारों का पालन करते हैं जिसे ‘तर्पण’ कहा जाता है। इस धार्मिक कृत्य के बाद, भीड़ कपिल मुनि के मंदिर में एकत्रित होकर ‘महापूजा’ और ‘यज्ञ’ अनुष्ठान में सम्मिलित होती है। इस प्रकार इस तेजस्वी संत को याद करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है। नागा साधु भी उनके पास पहुँचे श्रद्धालुओं को अपने अद्‌भुत कृत्यों से आशीर्वाद देते हैं जो हमें विस्मित रूप से अनुप्राणित करते हैं।

संध्या बेला में, दीये (मिट्टी के दीप) जलाये जाते हैं एवं सुशोभित नदी में इन्हें प्रवाहित किया जाता है। संध्याकालीन आरती की जाती है जिसकी वंदना से हवाएँ धार्मिक भावों से गुंजायमान हो उठती हैं। नदी में प्रवाहित हो रहे लाखों जलते दीये मानवता की नैसर्गिक यात्रा की याद दिलाते हैं।

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